Tuesday, 28 June 2016

मृगतृष्णा

मृगतृष्णा

जल ही जीवन है;
एक सरल. किंतु सारगर्भित वाक्य।
परंतु क्या केवल घोषणाएँ,
लघुपट, बैनर या संदेश काफी हैं
इस वाक्य को सार्थक करने में

कल ही स्कूलों में बच्चों को
यही तत्वज्ञान समझाया गया,
सिर्फ एक बूँद ही काफी है
प्यासे की तृष्णा मिटाने को।
फिर क्यों नलों से बहते अश्रु
देखकर भी नहीं पोंछते हम जानकार
बहती हुई यह जलधारा
हमको मुँह चिढ़ाती है
हमारे दोगुलेपन पर मानो
वही अनगिनत आँसू बहाती है।

जल है तो कल है
यह भी नारा पुराना है,
बरसों टैंकरों से बहता पानी
सड़कों पर ज्यों लाता निखार है।
बूँद-बूँद टपकता जल ही
कल पर हमारे हँसता है,
कथनी-करनी में इतने अंतर को,
वो भी शायद समझ न पाता है।

पिलाना जल, पुण्य का काम
सुना था मैंने बचपन से;
पर धूप से त्रस्त इक पगले को
वंचित देखा पानी से।
उसकी तड़प और लोगों की झिड़क-
देख रहे थे वो जो साक्षर थे।
देख तमाशा हैवानियत का ये
स्तब्ध रह गया बोतल का जल,
अब क्या रोना इंसानियत हेतु
अर्थी-सजा श्मशान-राह  में।

अब भी वक्त नहीं गुज‌रा है
मानव तू अब भी जाग;
पछतावे के आँसू का भी
वरना जल सूखा पड़ जाएगा।
अब नहलाओ प्रेम-स्निग्ध से,
मानव-तन को मन लौटाओ।
इस अविचारी, स्वार्थी जगत को
पावन कर, मानवीय बनाओ।

मैं-तू, तू-मैं, जड़ है हार की,
प्यार बाँटो, दया करो और फिर
जीत का परचम तुम फैराओ।
जल ही जीवन, प्रेम ही धर्म है
यह संदेश अब जब में फैलाओ।


-श्रीमती सुजाता कर्डिले


Interesting facts about India

Interesting facts about India 

1) THE FLOTING POST OFFICE

the floating post office in Dal lake Srinagar was istablished in Aug 2011. India has largest postal network in world. 1,55,015 posts offices and a single post office serves a population of 7,175 people.


2) KUMBH MELA
 Kumbh mela was the largesr gathering people mela with approx 75 millions pilgrims. Peoples are gathered so huge.


3) HIGHEST CRICKET GROUND IN WORL
The chail cricket ground in chail, Himachal pradesh is highest in tha world with an altitude of 2,444 meters. In 1893 it was built and it was also a part of chail military school.

4)IN  SWITZERLAND THE SCEINCE DAY WAS DEDICATED TO OUR EX PRESIDENT APJ ABDUL KALAM
 In 2006 the father of india's missible programme had visited to switzerland. When he arrivef there Switzerland declared that 26th as science day.

5)  INDIA'S FIRST PRESIDEND TOOK 50% OF HIS SALARY 
 Dr. Rajendra prashad when he appoint for presedent he took only 50% of his salary and told that he didn't required more than that.

6)  THE FIRST ROCKET OF INDIA WAS TRASPORT ON CYCLE
 In thirivananthapuram kerela first rocket was transported on bycycle to the Thumba launching station .

7) INDIA IS THE SECOND LARGEST ENGLISH SPEAKING COUNTRY 
 After USA india is the second largest english speaking country. 125 million people spoke english which is only 10% of our population.

8) INDIA WAS THE FIRST COUNTRY WHICH CONSUME SUGAR.
 India was the first country who develop purifing sugar. Many visitors of abroad learnt to purify sugar.

8) RABINDRA NATH TIGORE IS AN INDIAN WHO WROTE THE NATIONAL ANTHEM OF BENGLADESH.
 Rabinda nath Tigore is credited not only our anthm "JANA GANA MANA " . He also write Begladeshi Anthem "AMAR SONAR BANHLA "

9) OUR HUMAN CALCULATOR 
 Shakuntla devi was first woman who calculate 13 digit numbers 7,686,369,774,870×2,465,099,754,779 which were pocked randomly. And she answered correctly in 2i sec.

10) VISWANATH ANAND WON CHESS IN THREE DIFF FORMATS 
 Viswanath Anand was the first player who won chess in the world championship in three diff. formats ... knockout , tournament and match.


 DIVYA BHUSHAN

केंद्र लोकसेवा आयोग की तरफ युवाओ के कदम!

केंद्र लोकसेवा आयोग की तरफ युवाओ के कदम!

पिछले कुछ सालो से केंद्र लोकसेवा आयोग और केंद्र सेवा परीक्षाओ की ओर युवापीढ़ी का आकर्षण बढ़ता दिखाई जा रहा है जो की बहुत प्रशंसनीय बात है. आजके युवक सिर्फ कॉर्पोरेट और प्राइवेट क्षेत्रो में काम करनेमे अपनी रूची ना दिखाते हुए डिफेंस सर्विसेस और केंद्र सेवा जैसी कठिन और हर कदम पर चुनौतियों भरी सेवाओ में काम करने की भी इच्छा दिखा रहे है. समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभाने और अपना व्यक्तिमत्व विकास बढ़ाने हेतु युवा पूरी तरह से जी जान लगाकर मेहनत करते नजर आ रहे है. महाविद्यालयीन पढाई करते समय से ही इन सेवाओ में कार्यरत होने की मंछा युवाओ में देखी जा रही है. इसीलिए युवा इन सेवाओ से जुडी परीक्षा के तैयारी में महाविद्यालयीन शिक्षण लेते समयसे ही जुड़ जाते है. केंद्रीय लोकसेवा आयोग, डिफेंस सर्विसेस, एनडीए- एनए, रेल्वे रिक्रुइटमेंट बोर्ड, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन इन जैसी कई परीक्षाओ में सफलता पाने के लिए विद्यार्थी परीक्षाओ की माध्यम से अपनी किस्मत आजमा रहे है. हर साल केंद्र सरकार की रिक्त पदों की भर्तियो के लिए केंद्र लोकसेवा आयोग परीक्षाए आयोजित करता है उनमें अपनी एक जगह बनाने हेतु लाखोसे युवा इन परीक्षाओ मे हाजरी लगाते दिखाई जाते है. उनमेसे सिर्फ कुछ हजार ही युवक-युवतियां चुने जाते है और आखिर में वही इन सेवामें शामिल होते है जो इन सर्विसेस मे काम करने काबिल हो. आजकल प्राइवेट और कॉर्पोरेट क्षेत्रो में बड़े पैमाने में रोजगार उपलब्ध होता जा रहा है. परंतु केंद्र लोकसेवा आयोग परीक्षाओ की पढाई कर रहे युवको के हिसाब से असली काम करने का आनंद तो उसी क्षेत्र मे है जिसमे से हम अपने देश की सेवा में कुछ योगदान दे सके. इसी वजह से बडे पैमाने पर केंद्र लोकसेवा आयोग की परीक्षा के लिए युवाओ की भीड़ दिखाई देती है. यूपीएससी भारत देश की सबमे कठिन और युवको को पदपद पर चुनौतियां देने वाली परीक्षा मानी जाती है. इन परीक्षाओ की पढाई के दौरान विद्यार्थी जिस अनुभव से गुजरते है वे अनुभव उन्हें उनके पुरे जीवनभर काम आता है. इनमे वही सफल होते है जो कड़ी निष्ठा और ईमानदारी से परीक्षा देते है. इन सेवाओ मे भारतीय प्रशासकीय सेवा, भारतीय पुलीस सेवा, पोस्टल सेवा, राजस्व सेवा, रेल्वे सेवा, वनसेवा आदि सेवाए मौजुद है. जब युवाओ से पूछा गया की केंद्र लोकसेवा आयोग की तरफ उनका आकर्षण क्यों बढ रहा है तब जवाब मिला की जो व्यक्ति अपने समाज और अपने देश के लिए कुछ करने की इच्छा हो उनके लिए इन सेवाओ में काम करना गर्व की बात होगी. आजकल सभी क्षेत्र जैसे की अभियांत्रिकी, वैद्यकीय, विज्ञान क्षेत्र, कलाक्षेत्र, वाणिज्य क्षेत्र अन्य कई क्षेत्रों में शिक्षण लेने वाले विद्यार्थी यूपीएससी की परीक्षा देते है. कुछ युवाओ के लिए तो दिन की शुरुआत यूपीएससी की पढाई से और ख़त्म भी उसीसेही होती है. युवको का सेवा में कार्यरत होने के लिए देखा जा रहा जोश और जब तक सिलेक्शन नही हो जाता तब तक कि गयी कोशिशे देखकर ऐसा लगता है की समाज के प्रति जो उनका कर्तव्य है उसे निभाने हेतु वे तत्पर हो रहे है. सभी इन परीक्षाओ में सफल नही होते पर फिर भी सामाजिक कार्यो में अपना योगदान मिलना चाहिए इस हेतु से अनेक युवा आज अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से वक्त निकालकर अनेक सामाजिक संस्थाए, एनजीओ, सोशल क्लब जैसी समाज के लिए कार्यरत संस्थाओ में काम करके समाज कार्यो में अपना योगदान दे रहे है जो की एक बहुत ही गौरवतलब बात है. 

● सौरभ झेंडे

सीखते जाना है

सीखते जाना है

ज़िन्दगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ सीखते जाना है
गली के नुक्कड़ से लेकर आसमान तक
जहाँ नज़रें उठाओ 
कुछ न कुछ सीखने को मिल जाता है ।

एक बच्चे को देखा , 
उसकी मासूमियत मन को मोह गयी 
एक चींटी को देखा 
उसकी पहाड़ चड़ने की जद्दो जहद 
दिल को छू गयी
एक चील को देखा
उसकी तरह ऊंचा उड़ने की ख्वाइश 
मन को हो गयी ।

चलते चलते राह में उत्तम बनने का तो पता नहीं
पर एक कोशिश ज़रूर करते जाना है 
सही गलत का तो पता नहीं
पर अच्छा बनने की होड़ में
हर किसी से कुछ न कुछ सीखते जाना है ।
                                     
आरज़ू अग्रवाल

देश का सरदर्द : जल और जंगल

देश का सरदर्द : जल और जंगल


देश भयावह सूखे से जूझ रहा है तथा जल और जंगल इंसान का साथ छोड़ रहे हैं. कोयले की खुदाई के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है. जिससे जंगल में रहने वाले हाथी का प्राकृतिक घर तबाह हो रहा है. जब ये हाथी आकर गांवों में कोहराम मचाते हैं तो यह बात कभी नहीं उठाई जाती है कि यह आखिरकार मनुष्य ही है जिसने हाथियों को गांव आने के लिये मजबूर किया है. खासतौर पे शहरों को स्मार्ट बनाने के नाम पर वहां पेड़ काटे जा रहें हैं. मनुष्य ने प्रकृति को इतना छेड़ दिया है कि उसका खुद का अस्तित्व ही खतरें में पड़ गया है
.
सब कुछ हो रहा है विकास तथा औद्योगिकरण के नाम पर. ऐसे में सवाल किया जाना चाहिये कि ऐसा विकास किस काम का जिससे मानव का अस्तित्व ही खतरें में पड़ जाये? मानव जीवन के लिए जल, जंगल और जमीन तीनों प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता नितांत आवश्यक है, लेकिन अफसोस तीनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.

इंसान की आधुनिक विकासवादी सोच जाने हमें कहां ले जा रही है? वह इतना आधुनिक हो चला है कि जिस डाल पर वह बैठा है उसे ही काट रहा है. देश जल और जलंग दोनों के संकट से जूझ रहा है.दक्षिण भारत के मराठवाड़ा, बुंदेलखंड समेत दस राज्य सूखे की चपेट हैं. मराठवाड़ा और लातूर में इतनी भयावह स्थिति है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है. मासूम बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए कीचड़युक्त गंदे पानी को जीभ से पी रहे हैं. पानी की तलाश में गहरे कुएं तक में उतर जा रहे हैं. चहुंओर सूखा ही सूखा.

दक्षिण में जल संकट और उत्तर में जलता जंगल, लेकिन इस विकट स्थिति के समाधान का रास्ता दूर-दूर तक नहीं. पानी के बिना हजारों पशु-पक्षी दमतोड़ चुके हैं. सरकार को इन इलाकों के लिए वाटर रेल चलाना पड़ रहा है. लातूर में धारा 144 लगानी पड़ी है. जल माफिया के कारण जलाशयों पर पुलिस का पहरा बिठाना पड़ा
.
जरा सोचिए, जहां कभी दूध की नदियां बहती थी और जिस देश को उसकी नदियों के नाम से दुनिया में जाना जाता है, वह आज जल संकट जैसी भयंकर त्रासदी से जूझ रहा है.प्रकृति की कितनी बिडंबना है की समाधान के नाम पर हमारे पास कुछ नहीं हैं. सरकार असहाय दिखती है. जब जल, जंगल और जमीन ही उपलब्ध नहीं रहेगें, तो इंसान और उसका वजूद क्या सुरक्षित रहेगा? अपने आप में यह बड़ा सवाल है.

ग्रामीण इलाकों की स्थिति तो और भी बुरी है. देश के प्रत्येक पांच घरों में जल संकट विद्यमान है. हम अपनी बात नहीं करते हैं. यह खुद देश के कृषिमंत्री का बयान है. ग्रामीण परिवारों की आबादी करीब 17 करोड़ से अधिक है, जिसमें 25 फीसदी से अधिक यानी 4,41,390 घरों में पेयजल की त्रासदी चरम पर है और 15,345 घरों में सरकार टैंकर से पानी उपलब्ध करा रही है. 13,372 बोरवेल खोदे गए हैं. 44,498 नए बोरबेल पर काम चल रहा है.यह सरकारी बयानबाजी है, लेकिन धरातलीय स्थिति इससे कहीं और विकट है. इसकी जड़ में हमारी विकासवादी वैज्ञानिक सोच ही है जिसका नतीजा हमें भुगतना पड़ रहा है.

परंपरागत जलस्रोतों का अस्तित्व खत्म हो चला है. गांवों में आज भी कुएं पेयजल का जरिया हैं, लेकिन उनकी स्थिति बद से बदतर है. तालाबों को पाट कर आलीशान मकान बना लिए गए हैं. वर्षा के जल संरक्षण के संबंध में बनाई गई नीति बेमतलब साबित हो रही है.

मनरेगा केवल वोट बैंक का और पंचायतों के लिए लूट का माध्यम बनी है. विकास से इसका वास्ता नहीं रहा. इसके अलावा इंसानी और जंगली जीवों के लिए जंगल सबसे अहम है, लेकिन मानव की भोग लिप्सा ने जंगलों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा कर दिया.

अधाधुंध विकास की परिभाषा ने नई समस्या खड़ी कर दी. हाल फिलहाल मे उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग हमारे लिए बड़ी चुनौती साबित हुई, हम जंगल की आग पर नियंत्रण नहीं पा सके और इस कारण जंगली जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया ,सूखे के कारण स्थिति और विकट हो चली नतीजा, आग का दावानल हर पल नए क्षेत्रों को अपनी चपेट में लेता चला।उत्तराखंड के 13 जिलों में यह आग फैली 1500 गांवों और तकरीबन 90 दिनों तक जंगलों में आग लगी रही और उसे बुझाना बोहित मुश्किल होता चला गया. इससे यह साबित होता है कि आग नियंत्रण को लेकर उत्तराखंड प्रशासन और राज्य का वनमंत्रालय संवेदनशील नहीं रहा. अगर उसने जरा संवेदनशीलता और सतर्कता दिखाई होती, तो स्थिति वैसी न होती.

आग इतनी भयानक थी कि एक राष्ट्रीय राजमर्ग को भी बंद करना पड़ा. राज्यपाल ने 6000 हजार से अधिक लोगों को आग पर काबू पाने के लिए तैनात किया और पांच करोड़ की राशि मंजूर की गई । चीड़ के जंगलों में यह आग और अधिक फैलती है. चीड़ के पेड़ जब आग पकड़ते हैं, तो यह पेट्रोल का काम करते हैं. जगंलों में आग कभी-कभी बिजली गिरने और गर्मियों के कारण लगती है. कभी यह मानवीय भूलों और गलतियों से लगती है.लोग जंगल से गुजरते वक्त धूम्रपान करने के बाद सिगरेट व बीड़ी छोड़ देते हैं, जो सूखे पत्तों आग की जद में आकर दावानल बन जाते हैं. अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो धरती पर औसत सौ बार आसमानी बिजली गिरती है. इस तरह की घटनाएं उत्तरी अमरीका के जंगलों में अधिक होती हैं.

दूसरी वजह हवा में आक्सीजन की मात्रा अधिक होने से आग अधिक तेज फैलती है, क्योंकि आक्सीजन आग को जलाने में सहायक होती है.देश में जल और जंगल का संकट हमारे लिए विचारणीय बिंदु है. आजादी के कई वर्षो बाद हमने इस तरह का कोई ऐसा तंत्र नहीं विकसित किया, जिससे इस तरह की आपदाओं से निपटा जाए. हमारी आंख नहीं खुल रही है. हमारे लिए यह सबसे चिंतनीय है.

वक्त रहते अगर हमने होश नहीं ली तो जल, जंगल और जमीन हमारे लिए बड़ी मुसीबत खड़ी करेंगे और इसका समाधान हमारे पास उपलब्ध नहीं होगा. फिर हमें इंसानी जिंदगी को बसाने के लिए आसमान की तलाश करनी होगी, जबकि हमारे विकास, संस्कृति और सभ्यता में सहायक जल और जंगल नहीं होंगे. फिर हमारा अस्तित्व कहां होगा? सोचिए अब वक्त आ गया.
-राहुल खंड़ालकर

राजन को क्यों जाना पड़ रहा है?

राजन को क्यों जाना पड़ रहा है?

अब यह तय हो गया है रघुराम राजन आरबीआई के गवर्नर पद पर सितंबर के बाद नहीं रहेंगे. दरअसल, रघुराम राजन सितंबर माह में रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं. पिछले कुछ समय से इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि राजन को दुबारा इस पद के लिये चुना जायेगा कि नहीं. इसी बीच भारतीय राजनीति के ‘अभिमन्यु’ जिसे चक्रव्यूह में केवल घुसना आता है, सुब्रमणियम स्वामी ने उन पर ताबड़तोड़ हमला करना शुरु कर दिया.

स्वामी के राजन पे हमलों से देश की जनता के सामने यह संदेश गया कि मानो मोदी सरकार रघुराम राजन को इस पद पर नहीं चाहती है. स्वामी के आरोपों के बाद न तो वित्तमंत्री ने न ही प्रधानमंत्री ने इसका खंडन किया. जाहिर है कि इससे राजन को ठेस पहुंची तथा उन्होंने विवाद में पड़ने के पहले खुद ही अपने भविष्य का फैसला कर लिया.

याद रखिये कि रघुराम राजन न तो गरीबों के मसीहा हैं और न ही वह देश में कोई रामराज्य लाने वाले थे. रघुराम राजन दुनिया के वह अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने 2008 के भयानक आर्थिक मंदी के तीन साल पहले ही उसके बारें में आगाह कर दिया था. रघुराम राजन कॉर्पोरेट जगत को प्रिय एक अर्थशास्त्री हैं जो क्रोनी पूंजीवाद की खिलाफ़त करते हैं.

यह क्रोनी पूंजीवाद ही राजन के जाने के नेपथ्य में काम कर रहा है. याद कीजिये कि यह वह रघुराम राजन ही हैं जिन्होंने सबसे पहले सार्वजनिक बैंकों को उनका अकाउंट दुरस्त करने के लिये कहा था. राजन के प्रयासों के कारण ही बैंकों के उन खातेदारों के नाम कुछ हद तक लोगों की नज़र में आये जो हजारों-लाखों करोड़ रुपयों का कर्ज लेकर उसे डकार जाते हैं.

रघुराम राजन ने बैंकों से उनके एनपीए यानी की नान परफॉर्मिंग एसेट को कम करने को कहा. जाहिर है कि इससे सबसे ज्यादा चोट उन धन्ना सेठों को पहुंची जिनका काम ही बैंकों में जमा जनता के पैसों को कर्ज के रूप में लेकर उससे अपना साम्राज्य खड़ा करना है. जगजाहिर है कि उस कर्ज को चुकता करने की बारी आने पर वे विदेश भाग जाते हैं.

कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस समाचार समूह के द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उनके आरटीआई के जवाब में बताया था कि वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2015 के बीच 29 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 1.14 लाख करोड़ रुपयों के उधार बट्टे खाते में डाल दिये गये हैं. रिजर्व बैंक ने इनके नाम नहीं बताये हैं पर इसे आसानी से समझा जा सकता है कि निश्चित तौर पर यह आम जनता को दिये जाने वाले गाड़ी, मकान, शिक्षा या व्यक्तिगत लोन नहीं है. ऐसे मौकों पर तो बैंक वाले आम जनता पर लोटा-कंबल लेकर चढ़ाई कर देती है. जाहिर है कि कार्पोरेट घरानों की इसमें बड़ी हिस्सेदारी तय है.

राजन के कारण ही देश में बैंकों से कर्ज लेकर डकार जाने के खिलाफ़ माहौल बना है तथा जागृति आई है.
दूसरा, रघुराम राजन ने ब्याज की दर को कम नहीं किया. जबकि कई उद्योगपति इसकी राह देख रहे थे कि कब ब्याज की रकम कम हो तथा लोग उससे कर्ज लेकर खरीददारी करें. आज बाजार बैठा हुआ है इसलिये उद्योगपति चाहते हैं कि उनकों खरीददार मिले. ब्याज की दर कम करने से ऐसा मुमकिन हो सकता था. जबकि राजन ने मंदी में बाजार में पैसा डालने से इंकार कर दिया था.
अर्थशास्त्र को देखने-समझने के कई नज़रिये होते हैं. इस कारण से कई हमारी राय से सहमत नहीं भी हो सकते हैं. परन्तु यह क्रोनी पूंजीवाद ही है जो राजन के जाने के नेपथ्य में काम कर रहा है.
-राहुल खंड़ालकर

Monday, 20 June 2016

Political turmoil in Uttrakhand

Political turmoil in Uttrakhand

The political turmoil in the Uttrakhand from past few days led to the central government imposing President rule in the state under article 356 of the Indian Constitution. Uttrakhand congress government is facing the same type of crisis that it faced in the state of Arunachal Pradesh. Chief Minister Harish Rawat had to prove his majority in the house of legislative assembly on March 28 but a day before he could prove his majority president rule was imposed. It is shocking that before Harish Rawat could prove his majority on the floor of house of the assembly, the central government imposed Presidents rule in Uttrakhand.

The political crisis happened due to an internal rift in the congress party, 9 MLAs of congress withdrew their support to CM Harish Rawat. All this political havoc started when few congress MLAs challenged the majority of the ruling congress government inside the house. During the budget session of the Uttrakhand Legislative Assembly, the ruling congress government passed the Money Amendment Bill relating to the budget with the sound majority. 9 MLAs of congress were against passing of bill by sound majority and also they were not in favor of the bill. The final decision regarding the passed amendment bill is with the speaker of the house and his decision cannot be challenged.

The members of the Legislative Assembly have the full right to challenge the majority of the ruling government in the state. Therefore some of the rebel congress MLAs with their opposition MLAs went to the governor and complained to him that the ruling government does not have the required number to run the government, so they requested the governor to dismiss the Congress government. 

Governor considering their request had given the time till 28th march to Harish Rawat to prove his majority.The recent happenings in the Uttrakhand and the failure of government in the state led the President Pranab Mukerjee to impose the article 356 of the constitution. Harish Rawat would now challenge this decision in the Uttrakhand high court.

Under the anti defection law, the speaker govind kumar disqualified the 9 rebel congress MLAs from the house. This disqualification came after the 9 rebel congress MLAs failed to respond to the notices issued to them under anti defection law.

With 9 MLAs of congress being disqualified, the current strength of house has come down to 61and now the mark for majority to form government is 31. In the current scenario Harish Rawat has support of 27 MLAs and 6 MLAs are also supporting him 2 from BSP, 1 from Uttrakhand Kranti Dal and 3 independent, while BJP has its 28 MLAs.

While the numbers are in favor of Harish Rawat, it will be interesting to see who will form the government finally in Uttrakhand.   
Akshay Raina