Tuesday, 28 June 2016

देश का सरदर्द : जल और जंगल

देश का सरदर्द : जल और जंगल


देश भयावह सूखे से जूझ रहा है तथा जल और जंगल इंसान का साथ छोड़ रहे हैं. कोयले की खुदाई के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है. जिससे जंगल में रहने वाले हाथी का प्राकृतिक घर तबाह हो रहा है. जब ये हाथी आकर गांवों में कोहराम मचाते हैं तो यह बात कभी नहीं उठाई जाती है कि यह आखिरकार मनुष्य ही है जिसने हाथियों को गांव आने के लिये मजबूर किया है. खासतौर पे शहरों को स्मार्ट बनाने के नाम पर वहां पेड़ काटे जा रहें हैं. मनुष्य ने प्रकृति को इतना छेड़ दिया है कि उसका खुद का अस्तित्व ही खतरें में पड़ गया है
.
सब कुछ हो रहा है विकास तथा औद्योगिकरण के नाम पर. ऐसे में सवाल किया जाना चाहिये कि ऐसा विकास किस काम का जिससे मानव का अस्तित्व ही खतरें में पड़ जाये? मानव जीवन के लिए जल, जंगल और जमीन तीनों प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता नितांत आवश्यक है, लेकिन अफसोस तीनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.

इंसान की आधुनिक विकासवादी सोच जाने हमें कहां ले जा रही है? वह इतना आधुनिक हो चला है कि जिस डाल पर वह बैठा है उसे ही काट रहा है. देश जल और जलंग दोनों के संकट से जूझ रहा है.दक्षिण भारत के मराठवाड़ा, बुंदेलखंड समेत दस राज्य सूखे की चपेट हैं. मराठवाड़ा और लातूर में इतनी भयावह स्थिति है कि उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है. मासूम बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए कीचड़युक्त गंदे पानी को जीभ से पी रहे हैं. पानी की तलाश में गहरे कुएं तक में उतर जा रहे हैं. चहुंओर सूखा ही सूखा.

दक्षिण में जल संकट और उत्तर में जलता जंगल, लेकिन इस विकट स्थिति के समाधान का रास्ता दूर-दूर तक नहीं. पानी के बिना हजारों पशु-पक्षी दमतोड़ चुके हैं. सरकार को इन इलाकों के लिए वाटर रेल चलाना पड़ रहा है. लातूर में धारा 144 लगानी पड़ी है. जल माफिया के कारण जलाशयों पर पुलिस का पहरा बिठाना पड़ा
.
जरा सोचिए, जहां कभी दूध की नदियां बहती थी और जिस देश को उसकी नदियों के नाम से दुनिया में जाना जाता है, वह आज जल संकट जैसी भयंकर त्रासदी से जूझ रहा है.प्रकृति की कितनी बिडंबना है की समाधान के नाम पर हमारे पास कुछ नहीं हैं. सरकार असहाय दिखती है. जब जल, जंगल और जमीन ही उपलब्ध नहीं रहेगें, तो इंसान और उसका वजूद क्या सुरक्षित रहेगा? अपने आप में यह बड़ा सवाल है.

ग्रामीण इलाकों की स्थिति तो और भी बुरी है. देश के प्रत्येक पांच घरों में जल संकट विद्यमान है. हम अपनी बात नहीं करते हैं. यह खुद देश के कृषिमंत्री का बयान है. ग्रामीण परिवारों की आबादी करीब 17 करोड़ से अधिक है, जिसमें 25 फीसदी से अधिक यानी 4,41,390 घरों में पेयजल की त्रासदी चरम पर है और 15,345 घरों में सरकार टैंकर से पानी उपलब्ध करा रही है. 13,372 बोरवेल खोदे गए हैं. 44,498 नए बोरबेल पर काम चल रहा है.यह सरकारी बयानबाजी है, लेकिन धरातलीय स्थिति इससे कहीं और विकट है. इसकी जड़ में हमारी विकासवादी वैज्ञानिक सोच ही है जिसका नतीजा हमें भुगतना पड़ रहा है.

परंपरागत जलस्रोतों का अस्तित्व खत्म हो चला है. गांवों में आज भी कुएं पेयजल का जरिया हैं, लेकिन उनकी स्थिति बद से बदतर है. तालाबों को पाट कर आलीशान मकान बना लिए गए हैं. वर्षा के जल संरक्षण के संबंध में बनाई गई नीति बेमतलब साबित हो रही है.

मनरेगा केवल वोट बैंक का और पंचायतों के लिए लूट का माध्यम बनी है. विकास से इसका वास्ता नहीं रहा. इसके अलावा इंसानी और जंगली जीवों के लिए जंगल सबसे अहम है, लेकिन मानव की भोग लिप्सा ने जंगलों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा कर दिया.

अधाधुंध विकास की परिभाषा ने नई समस्या खड़ी कर दी. हाल फिलहाल मे उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग हमारे लिए बड़ी चुनौती साबित हुई, हम जंगल की आग पर नियंत्रण नहीं पा सके और इस कारण जंगली जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया ,सूखे के कारण स्थिति और विकट हो चली नतीजा, आग का दावानल हर पल नए क्षेत्रों को अपनी चपेट में लेता चला।उत्तराखंड के 13 जिलों में यह आग फैली 1500 गांवों और तकरीबन 90 दिनों तक जंगलों में आग लगी रही और उसे बुझाना बोहित मुश्किल होता चला गया. इससे यह साबित होता है कि आग नियंत्रण को लेकर उत्तराखंड प्रशासन और राज्य का वनमंत्रालय संवेदनशील नहीं रहा. अगर उसने जरा संवेदनशीलता और सतर्कता दिखाई होती, तो स्थिति वैसी न होती.

आग इतनी भयानक थी कि एक राष्ट्रीय राजमर्ग को भी बंद करना पड़ा. राज्यपाल ने 6000 हजार से अधिक लोगों को आग पर काबू पाने के लिए तैनात किया और पांच करोड़ की राशि मंजूर की गई । चीड़ के जंगलों में यह आग और अधिक फैलती है. चीड़ के पेड़ जब आग पकड़ते हैं, तो यह पेट्रोल का काम करते हैं. जगंलों में आग कभी-कभी बिजली गिरने और गर्मियों के कारण लगती है. कभी यह मानवीय भूलों और गलतियों से लगती है.लोग जंगल से गुजरते वक्त धूम्रपान करने के बाद सिगरेट व बीड़ी छोड़ देते हैं, जो सूखे पत्तों आग की जद में आकर दावानल बन जाते हैं. अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो धरती पर औसत सौ बार आसमानी बिजली गिरती है. इस तरह की घटनाएं उत्तरी अमरीका के जंगलों में अधिक होती हैं.

दूसरी वजह हवा में आक्सीजन की मात्रा अधिक होने से आग अधिक तेज फैलती है, क्योंकि आक्सीजन आग को जलाने में सहायक होती है.देश में जल और जंगल का संकट हमारे लिए विचारणीय बिंदु है. आजादी के कई वर्षो बाद हमने इस तरह का कोई ऐसा तंत्र नहीं विकसित किया, जिससे इस तरह की आपदाओं से निपटा जाए. हमारी आंख नहीं खुल रही है. हमारे लिए यह सबसे चिंतनीय है.

वक्त रहते अगर हमने होश नहीं ली तो जल, जंगल और जमीन हमारे लिए बड़ी मुसीबत खड़ी करेंगे और इसका समाधान हमारे पास उपलब्ध नहीं होगा. फिर हमें इंसानी जिंदगी को बसाने के लिए आसमान की तलाश करनी होगी, जबकि हमारे विकास, संस्कृति और सभ्यता में सहायक जल और जंगल नहीं होंगे. फिर हमारा अस्तित्व कहां होगा? सोचिए अब वक्त आ गया.
-राहुल खंड़ालकर

राजन को क्यों जाना पड़ रहा है?

राजन को क्यों जाना पड़ रहा है?

अब यह तय हो गया है रघुराम राजन आरबीआई के गवर्नर पद पर सितंबर के बाद नहीं रहेंगे. दरअसल, रघुराम राजन सितंबर माह में रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं. पिछले कुछ समय से इस बात के कयास लगाये जा रहे थे कि राजन को दुबारा इस पद के लिये चुना जायेगा कि नहीं. इसी बीच भारतीय राजनीति के ‘अभिमन्यु’ जिसे चक्रव्यूह में केवल घुसना आता है, सुब्रमणियम स्वामी ने उन पर ताबड़तोड़ हमला करना शुरु कर दिया.

स्वामी के राजन पे हमलों से देश की जनता के सामने यह संदेश गया कि मानो मोदी सरकार रघुराम राजन को इस पद पर नहीं चाहती है. स्वामी के आरोपों के बाद न तो वित्तमंत्री ने न ही प्रधानमंत्री ने इसका खंडन किया. जाहिर है कि इससे राजन को ठेस पहुंची तथा उन्होंने विवाद में पड़ने के पहले खुद ही अपने भविष्य का फैसला कर लिया.

याद रखिये कि रघुराम राजन न तो गरीबों के मसीहा हैं और न ही वह देश में कोई रामराज्य लाने वाले थे. रघुराम राजन दुनिया के वह अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने 2008 के भयानक आर्थिक मंदी के तीन साल पहले ही उसके बारें में आगाह कर दिया था. रघुराम राजन कॉर्पोरेट जगत को प्रिय एक अर्थशास्त्री हैं जो क्रोनी पूंजीवाद की खिलाफ़त करते हैं.

यह क्रोनी पूंजीवाद ही राजन के जाने के नेपथ्य में काम कर रहा है. याद कीजिये कि यह वह रघुराम राजन ही हैं जिन्होंने सबसे पहले सार्वजनिक बैंकों को उनका अकाउंट दुरस्त करने के लिये कहा था. राजन के प्रयासों के कारण ही बैंकों के उन खातेदारों के नाम कुछ हद तक लोगों की नज़र में आये जो हजारों-लाखों करोड़ रुपयों का कर्ज लेकर उसे डकार जाते हैं.

रघुराम राजन ने बैंकों से उनके एनपीए यानी की नान परफॉर्मिंग एसेट को कम करने को कहा. जाहिर है कि इससे सबसे ज्यादा चोट उन धन्ना सेठों को पहुंची जिनका काम ही बैंकों में जमा जनता के पैसों को कर्ज के रूप में लेकर उससे अपना साम्राज्य खड़ा करना है. जगजाहिर है कि उस कर्ज को चुकता करने की बारी आने पर वे विदेश भाग जाते हैं.

कुछ समय पहले इंडियन एक्सप्रेस समाचार समूह के द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उनके आरटीआई के जवाब में बताया था कि वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2015 के बीच 29 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 1.14 लाख करोड़ रुपयों के उधार बट्टे खाते में डाल दिये गये हैं. रिजर्व बैंक ने इनके नाम नहीं बताये हैं पर इसे आसानी से समझा जा सकता है कि निश्चित तौर पर यह आम जनता को दिये जाने वाले गाड़ी, मकान, शिक्षा या व्यक्तिगत लोन नहीं है. ऐसे मौकों पर तो बैंक वाले आम जनता पर लोटा-कंबल लेकर चढ़ाई कर देती है. जाहिर है कि कार्पोरेट घरानों की इसमें बड़ी हिस्सेदारी तय है.

राजन के कारण ही देश में बैंकों से कर्ज लेकर डकार जाने के खिलाफ़ माहौल बना है तथा जागृति आई है.
दूसरा, रघुराम राजन ने ब्याज की दर को कम नहीं किया. जबकि कई उद्योगपति इसकी राह देख रहे थे कि कब ब्याज की रकम कम हो तथा लोग उससे कर्ज लेकर खरीददारी करें. आज बाजार बैठा हुआ है इसलिये उद्योगपति चाहते हैं कि उनकों खरीददार मिले. ब्याज की दर कम करने से ऐसा मुमकिन हो सकता था. जबकि राजन ने मंदी में बाजार में पैसा डालने से इंकार कर दिया था.
अर्थशास्त्र को देखने-समझने के कई नज़रिये होते हैं. इस कारण से कई हमारी राय से सहमत नहीं भी हो सकते हैं. परन्तु यह क्रोनी पूंजीवाद ही है जो राजन के जाने के नेपथ्य में काम कर रहा है.
-राहुल खंड़ालकर

Monday, 20 June 2016

Political turmoil in Uttrakhand

Political turmoil in Uttrakhand

The political turmoil in the Uttrakhand from past few days led to the central government imposing President rule in the state under article 356 of the Indian Constitution. Uttrakhand congress government is facing the same type of crisis that it faced in the state of Arunachal Pradesh. Chief Minister Harish Rawat had to prove his majority in the house of legislative assembly on March 28 but a day before he could prove his majority president rule was imposed. It is shocking that before Harish Rawat could prove his majority on the floor of house of the assembly, the central government imposed Presidents rule in Uttrakhand.

The political crisis happened due to an internal rift in the congress party, 9 MLAs of congress withdrew their support to CM Harish Rawat. All this political havoc started when few congress MLAs challenged the majority of the ruling congress government inside the house. During the budget session of the Uttrakhand Legislative Assembly, the ruling congress government passed the Money Amendment Bill relating to the budget with the sound majority. 9 MLAs of congress were against passing of bill by sound majority and also they were not in favor of the bill. The final decision regarding the passed amendment bill is with the speaker of the house and his decision cannot be challenged.

The members of the Legislative Assembly have the full right to challenge the majority of the ruling government in the state. Therefore some of the rebel congress MLAs with their opposition MLAs went to the governor and complained to him that the ruling government does not have the required number to run the government, so they requested the governor to dismiss the Congress government. 

Governor considering their request had given the time till 28th march to Harish Rawat to prove his majority.The recent happenings in the Uttrakhand and the failure of government in the state led the President Pranab Mukerjee to impose the article 356 of the constitution. Harish Rawat would now challenge this decision in the Uttrakhand high court.

Under the anti defection law, the speaker govind kumar disqualified the 9 rebel congress MLAs from the house. This disqualification came after the 9 rebel congress MLAs failed to respond to the notices issued to them under anti defection law.

With 9 MLAs of congress being disqualified, the current strength of house has come down to 61and now the mark for majority to form government is 31. In the current scenario Harish Rawat has support of 27 MLAs and 6 MLAs are also supporting him 2 from BSP, 1 from Uttrakhand Kranti Dal and 3 independent, while BJP has its 28 MLAs.

While the numbers are in favor of Harish Rawat, it will be interesting to see who will form the government finally in Uttrakhand.   
Akshay Raina       


मथुरा कांड: सवाल कई,जवाब नही!

मथुरा कांड: सवाल कई,जवाब नही!

अब उसे कंस कहें या नृशंस, कोई फायदा नहीं. पूरे देश के सामने जो सच सामने आया, उसने राज्य और केन्द्र के खुफिया तंत्र की कलई खोलकर रख दी. सवाल तो सुलगेगा, लंबे समय तक सियासत भी होगी, होनी भी चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की आहट के ऐन पहले इस हकीकत ने पूरे देश को सन्न कर दिया है. अभी तो प्रश्नों की बौछार आनी शुरू हुई है, लगातार झड़ी बाकी है.

मथुरा कई दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील है. धार्मिक नगरी के रूप में आस्था और श्रद्धा का केंद्र है, यहीं बड़ी तेल रिफायनरी भी है. लगभग 1085 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के जरिए यहां तेल शोधन के लिए लाया जाता है. ऐसे में मथुरा राज्य और केन्द्र, दोनों के खुफिया तंत्र के राडार पर होना चाहिए. बड़ा सवाल, ऐसा क्यों नहीं हुआ?

हैरानी की बात है कि सत्याग्रह के नाम पर दो दिनों के लिए पनाह की खातिर मिली 270 एकड़ जमीन पर अपनी समानान्तर सरकार चलाने वाले कंस रूपी रामवृक्ष पर दो वर्षों में ही 10 से ज्यादा मुकदमे कायम किए गए, लेकिन उसका कुछ भी नहीं बिगड़ पाया. जाहिर है यह सब केवल कागजी खानापूर्ति की रस्म अदायगी थी.

भूखे, बेरोजगार, गरीब और मुसीबत के मारों को मिलाकर बना संगठन, किस खूबी से मथुरा में काम कर रहा था और प्रशासन किस कदर नाकाम था! आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में शायद ही ऐसा उदाहरण कहीं मिले कि प्रशासन की नाक के नीचे, खुले आम किसी की बादशाहत चलती रहे और पास में ही जिले के मुखिया अंधे-गूंगे-बेहरे बने बैठे रहें. उससे बड़ी शर्मनाक घटना यह रही कि हथियार, गोला बारूद, बम और न जाने क्या-क्या इकट्ठे होते रहे और खुफिया तंत्र को कानों कान खबर तक नहीं हुई.

इसे चूक कहना नाइंसाफी होगा. निश्चित रूप से यह बिना राजनीतिक मदद के संभव नहीं है. लेकिन सवाल फिर भी यही कि मथुरा की सुरक्षा की जवाबदेही जितनी राज्य सरकार की बनती है, उतनी ही केन्द्र की भी. प्रशासन की नाक के नीचे कोई इतना बड़ा अपराधी बन जाए, यह रातोंरात संभव नहीं है. अहम यह कि लाखों की आबादी के बीच, शहर में सरकार के लिए चुनौती बना मुखिया देशद्रोह, विद्रोह, एकता-अखण्डता खण्डित करने की हुंकार भरे, पुलिस पर हमला करे सरकारी सम्पत्ति हथियाए और उस पर मामूली अपराधों के तहत मामले दर्ज हों!

पूछने वाले जरूर पूछेंगे कि हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार और न जाने कितने वे जो जब-तब देशद्रोह के कटघरे में आ जाते हैं, उनसे कैसे अलग था रामवृक्ष यादव?

अब तो रामवृक्ष यादव के नक्सलियों से तार जुड़े होने के सूबत भी मिल रहे हैं. जवाहर बाग की फैक्ट्री में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल से आतंक फैलाने का कच्चा माल आता था. इतना ही नहीं जरूरत के हिसाब से उपयोग के बाद ये गोला-बारूद वापस भी किया जाता था. सैकड़ों किलोमीटर दूर से आकर दो साल तक तबाही का यह बाजार सजता रहा और समूचा सुरक्षा तंत्र कुछ सूंघ तक नहीं पाया?

रामवृक्ष यादव का अतीत सबके सामने है. इटावा के ही तुलसीदास यादव यानी जय गुरुदेव का चेला था. उन्हीं की तर्ज पर ये भी सुभाषचंद्र बोस के नाम का इस्तेमाल करता था. 2012 मे जय गुरुदेव की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति पर तमाम लोगों की निगाहें थी. रामवृक्ष यादव सहित तीन प्रमुख दावेदार थे. दो अन्य उनका ड्राइवर पंकज यादव और एक अन्य चेला उमाकान्त तिवारी थे. सम्पत्ति कब्जाने में पंकज यादव सफल रहा जिसने रामवृक्ष को आश्रम से बाहर का रास्ता दिखाया.

रामवृक्ष के शातिर दिमाग ने राजनीति की ओर रुख किया और 2014 में फिरोजाबाद सीट पर जबरदस्त सक्रिय रहकर उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव के लिए अपने 3 हजार से ज्यादा समर्थकों के साथ खूब काम किया और चुनाव में जीत भी हासिल हुई. इससे उसकी हैसियत बढ़ी. कहते हैं तभी इसके मन में मथुरा के जवाहरबाग का सपना पला और दो दिन के लिए धरने के नाम पर आसानी से अनुमति ले ली (राजनैतिक निकटता के चलते मिलनी ही थी) और अपनी कथित फौज के साथ रामवृक्ष यादव ने वहां जो अपना डेरा जमाया, उसका अंत कैसे हुआ, यह सबके सामने है. कहते हैं कि उसने मथुरा में कभी भी तेज तर्रार अधिकारियों की अपने राजनैतिक दम पर नियुक्ति नहीं होने दी.

हैरानी वाली बात, रामवृक्ष यादव इतना सब कुछ करता रहा और प्रशासन नाकाम और अंधा कैसे बना रहा अचरज जरूर होता है इस घटना के बाद लोकतंत्र की दुहाई देने वालों के चेहरे भी अचानक लोगों को खुद-ब-खुद याद आने लगे हैं. विशेषकर वे, जो न्यायपालिका-कार्यपालिका-विधायिका की बातें करते हैं. कई मौकों पर न्यायपालिका को उसकी औकात जताने की कोशिश भी करते हैं, नसीहतें देते हैं.  अगर विधायिका और कार्यपालिका पर सवाल उठते हैं तो क्या गलत? लगता नहीं कि इतना बड़ा मामला शुरू होते ही प्रशासन की जानकारी में न आया हो. बस जवाब इतना ही चाहिए कि प्रशासन, सरकार और सुरक्षा तंत्र नाकाम क्यों रहा? इसका जवाब मिलेगा या नहीं, यह तो पता नहीं पर इतना जरूर पता है कि भला हो भारत की न्यायपालिका का जो कई मौकों पर खुद आगे आकर लोकतंत्र के लिए कड़े फैसले लेती है. भला ये लोकतंत्र के शहंशाहों को क्यों अच्छा लगेगा?
-राहुल खंड़ालकर


उज्जवल होती 'उज्जवला योजना'

उज्जवल होती 'उज्जवला योजना'


१ मई २०१६ देश के गरीबों के लिए एक बड़ा दिन क्योंकि यह देश के  गरीबों के  हित के  लिए केंद्र सरकार के द्वारा उठाया गया एक अहम कदम है जिसके अंतर्गत देश में रह रहे हज़ारों की संख्या में गरीब किसानों के परिवारों के खातिर एलपीजी यानि खाद्य बनने योग्य गैस को मुफ्त में वितरित किया गया | 

                           मई दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा उत्तर प्रदेश के बलिया शहर में  ग़रीबों के लिए मुफ्त में रसोई गैस कनेक्शन व साथ में चूल्हा देने की योजना "उज्जवला योजना " की शुरुआत की गई | इस मौके पर स्वयं प्रधानमंत्री ने देश के श्रमिक दर्जे के लोगों को नमन करते हुए कहा की 'दुनिया का सबसे बड़ा केमिकल  एक मज़दूर का पसीना होता है जिसमे दुनिया को जोड़ने की ताकत होती है साथ ही साथ उन्होंने स्वयं को भी एक मज़दूर नंबर १ बताया '

                           केंद्र द्वारा चलाई गए इस अहम योजना के अंतर्गत देश में रह रहे गरीबी रेखा के निचले दर्जे में लगभग ५ करोड़ परिवारों को इस योजना का लाभ मिलेगा जिसमे अमूमन ८००० करोड़ रुपए खर्च किए जायंगे | प्रधानमंत्री के उत्तर  प्रदेश के बलिया मात्र इकाई से इस योजना का शुभारम्भ किए जाने पर ज्ञात हुआ कि मात्र बलिया ही एक ऐसा जिला है जहाँ लगभग ८% बी पी एल परिवारों के पास गैस कनेक्शन उपलब्ध किए गये| जिस कारणवश यहाँ से इसकी शुरुआत मानी जा रही है परन्तु सोचने योग्य दूसरा मुद्दा यह भी है कि देश में बलिया यूपी के अतिरिक्त भी कई गाँव है जहां आज भी रसोई गैस की उपलब्धता नहीं है | इसके पीछे एक बड़ा विकल्प उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव २०१७ को भी माना जा सकता है | जिससे राज्य के लोगों का मन अपनी ओर आकर्षित किया जा सके | 

                         उज्जवला योजना का श्री गणेश इस बात को ध्यान में रख के किया गया है कि प्रत्येक वर्ष भारत में लगभग ४ से ५ लाख महिलाओं की मृत्यु सिर्फ घरों में जल रहे चूल्हे के धुंए की बिमारी के कारण हो जाती है जबकि तक़रीबन ४० से ५० लाख लोगों कि मृत्यु इससे हो रहे वायु प्रदूषण के कारण हो जाती है | इस योजना को पहले भी कई राज्य सरकारों के द्वारा प्रयोग में लाया जा चुका है | २०१४ में कर्नाटक सरकार के द्वारा प्रदुषण को कम करने के हित ओर महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए मुफ्त में एलपीजी कनेक्शन  देने की योजना बनाई गए थी | 

                        उज्जवला योजना के लोकार्पण करने के बाद मान्य प्रधानमंत्री ने इस योजना को चालू करने का श्रेय देश के १ करोड़ १० लाख परिवारों को दिया |जिन्होंने गैस सब्सिडी  छोड़कर यह सेवा गरीबो के लिए प्रदान की और साथ ही इसे "लेबर्स यूनाइट द वर्ल्ड " का नारा दिया | देश में चल रही यह योजना केंद्र द्वारा उठाया गया गरीबों व क्रमिक दर्जे के लिए अहम कदम हो सकता है जिसमे कई माँ बहनो को रोज़ के धुंए भरी सहर एवं रातों से निजात मिलेगी यदि इसके पीछे कोई राजनीति ना की गई हो और भविष्य में ना किए जाने की सम्भावना हो |

 REHAN AHMAD

प्रजातंत्र में भटकता तंत्र !!!!!!!!

प्रजातंत्र में भटकता तंत्र !!!!!!!!

वयवस्था की सबसे बड़ी व्यथा है कि वह व्यस्थापित नहीं हो पाती | एक तरफ जहां हर ओर शोर शराबो के बिच जनहित से जुड़े मुद्दों को कही ठंढे बक्से में समेट दिया जाता है तो वहीँ  दूसरी ओर मुद्दों का राजनीतीकरण कर उसकी महत्ता को भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| पर विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जहां प्रजा और तंत्र के बिच समावर्ती मेल मिलाप की परिकल्पना की जानी चाहिए वहा ना तो कोई तंत्र है और ना प्रजा !! इन सब के बिच अगर हम किसी को ज़िम्मेदार करार दे तो वो भी खुद प्रजा ही है| बात लगभग दो साल पहले की है जब देश की आबो हवा में एक नाम को सरकार के तौर पर या यूं कहे भारत का भाग्य विधाता के तर्ज पर रखा गया तब ही किसी को सोचना चाहिए था की आखिर एक इंसान की बदौलत इतना बड़ा तंत्र कैसे चलेगा ?? किसी  को पूछना चाहिए था कि आखिर वो कौन सा मॉडल है जिससे देश के काया कल्प होने की संभावनाएं थी | खैर ऐसा वादा पहली बार किसी पार्टी या गटबंधन ने नहीं किया पर इस बार की बात हर बार के धोखों को पाटने जैसी लगी थी तभी तो कही जा कर महाराष्ट्र,हरयाणा,झारखण्ड के साथ साथ जम्मू कश्मीर जैसी जगहों पर भी परचम लहरा गया | ना विचारधारा की परवाह ना मान मरियादाओं का सम्मान भूख बस सत्ता की नर्म कुर्सियों पर जमने जमाने की है चाहे वो पि.डी.पि  जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गटबंधन कर खुद पे साम्प्रदायिक होने का धब्बा कायम करना हो या बिहार में जंगल राज और विकाश पुरुष का साथ आना ये सब राजनीती के बदलते सुर है | देश में अब संसद का मतलब है राजनितिक अखाडा जहा हर सदस्य अपने प्रतिद्वंदी को किसी तरह परस्त कर ये दिखा दे की उसकी सरकार ने एक अंतराल में भारत के इतिहास ही बदल दिया है| बीते दो सत्रों में जिस तरह से सरकार और उसका रवैया रहा उस तरह से तो शायद ही भविष्यदृष्टा कही जाने वाली सरकार देश के भविष्य को सवार सकेगी | हाल फिहाल के दिनों में योजनाओं की भरमार के साथ साथ जिस तरह से धार्मिक असमानता को हवा मिली हैं शायद वो सत्ता दल के सम्प्रदिक होने का परीमाण सिद्ध करती हो | अब चाहे वो जाट आन्दोलन हो या राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद का हो या माता कही जाने वाली गाय पर जम कर एक दूसरे की  कौमों पर पानी पि-पि कर कोसना हो , हर तरफ तंत्र का खुल्ला मजाक उड़ाया जा रहा है | ऐसे परिवेश में आखिर जनता सवाल पूछे तो किससे ?? विश्वास करे तो किसकी मंशा पर करे वरना हरयाणा के जाटो की तरह घोषणा पत्र में आश्वासन दे कर दंगाइयों को न्योता देने का जोखीम भी इसी जनता को उठाना पड़ेगा!!

बात स्पष्ट है की अगर सरकार को बीते कुछ दिनों पर मरहम पट्टी लगनी है तो कम से कम अब साथ मिल कर एक दुसरे की बात समझ कर बिना किसी राजनीतिक फ़ायदे के जनहित मुद्दों को लागू करे नहीं तो प्रजातंत्र की येही ताकत जिसने उसे अर्श से फर्श तक पहुचाया उसकी दावेदारी अगले चुनाव तक मिटटी में मिला देगी |जिस तरह से हर माहौल को राजनीती से जोड़ कर आपस में लड़ने का सामन बना लिया जाता है उससे नुकसान सत्ता पक्ष का भी है और विपक्ष का भी..अलबत्ता ये बात अलग है कि जवाबदेही में सत्ता पक्ष को खड़ा होना होता है पर विपक्ष का ये दायित्व होता है कि अपनी मर्यादा कायम रखते हुए सरकार को काम करने दे |बीते दिनों संस्थाओ का बड़ा जोर शोर से राजनितिक लिपा पोती की गयी किसी को कांग्रेसियों का गढ़ बताया गया किसी को वाम दलों का अड्डा...

और इन्ही सब के बिच देशद्रोह,रास्त्रविरोधी जैसे आरोप भी लगे ...सत्यता का पता मुझे भी नहीं है पर हां कही ना कही ये भी सही है की विचारो की अभिव्यक्ति की आजादी का दुरपयोग भी किया गया है कही भारत विरोधी नारे लगे तो कोई दल उन्हें समजने या पूछने नहीं गया की आखिर ये सब कैसे हुआ ??? या ये पूछने की कोशिश नहीं की कि आखिर जिस संस्थान में ऐसी परिस्थिति बने गयी उसका ज़िम्मेदार कौन है ?? बल्कि इन सब से इतर हर बात को दंगो से या पकिस्तान से जोड़ कर जितना हो सके उसे कम्युनल बना देने की होड़ मची है |

गाँधी हो या पटेल या फिर किसी भी विचारधारा के समर्थक या फिर किसी धर्म के अनुयायी हर विचार और धर्म आपस का समझौता सिखाता है ना की आन्दोलन और दंगो में जाला कर शहर के शहर बर्बाद कर दे !! कोई उनका दर्द भी जा कर सुने की कूटनीति के खेल में जिस तरह से सरहदे बेबस हो जाती है बच्चे अनाथ हो कर बदला लेने की मानसिकता को बढ़ाते है शायद ये प्रजा तंत्र का आयाम नहीं है 



Sanjeev singh…

मेरा देश

मेरा देश


सुबह की मीठी नींद जब खुलती है,
खिड़की पर टंगे पर्दो के बीच मे से गुज़रती सूरज की किरने
मेरे चहरे पर पड़ती है,
दिन की व पहली मुस्कुराहट जताती है,
हाँ, ये मेरा देश है।

राजस्थान केरेगिस्तानों मे रेंगता हुआ वो एक फकीर,
बिना दरिया के अपने किनारे को तलाशता हुआ, चलता है
फिर गिरता संभलता है,
मानो ये मेरा दिल कहता है,
हाँ, ये मेरा देश है।

न मिट्टी के मोह का, वो चंद मिट्टी का
कही दूर दरिया मे खड़ा, एक पुरुष
जब देश की हर कन्या और कुमारी की ओर नज़र उठाकर देखता है, फिर देखना सिखाता है
दिल मे तब ये आवाज़ गूँजती है,
हाँ, ये मेरा देश है।

वहीं कही दूर, कश्मीर की वादियों मे- कली सा खिलता वो एक मुखड़ा
जब हँसता है,
वो वक़्त जब जन्नत खुद ये ज़मीन बन जाती है,
मानो ये मेरा दिल कहता है,
हाँ, ये मेरा देश है।

इन्ही चहल-पहल से कहीं दूर अरुणाचल,
जब सूरज की पहली किरणों के
मासूम कदमो से जगमगा उठता है,
मानो ये दिल कहता है,
हाँ, ये मेरा देश है।

कहीं गरम कही ठंड, ऐसी ही तोड़ती मरोड़ती शिलाखंड
जब अमृत सी मीठी ये भागीरथी,
मेरे होठों को चूम कर, उनमे मिठास भर जाती है।
मानो तब तब ये दिल कहता है,
हाँ, ये मेरा देश है।

कहने को हम बोहत कुछ कहे चुके,
पर अब भी कुछ शेष है।
क्यूंकी ये सिर्फ एक ज़मीन नहीं,
उसपर रहने वालों का भी देश है।
हाँ, ये मेरा देश है।




- इन्द्रनील नन्दी